हिंदू धर्म में कई ऐसे पर्व हैं जो स्वास्थ्य, प्रकृति और पारंपरिक जीवनशैली से जुड़े हुए हैं। उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण पर्व है बासोड़ा जिसे शीतला अष्टमी भी कहा जाता है। यह पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत के कई राज्यों जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और गुजरात में बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
बासोड़ा का पर्व मां शीतला को समर्पित होता है। इस दिन माता की पूजा करके परिवार के स्वास्थ्य और रोगों से रक्षा की कामना की जाती है। खास बात यह है कि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और एक दिन पहले बनाया गया ठंडा भोजन माता को भोग लगाया जाता है।
इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे:
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बासोड़ा 2026 कब है
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शीतला अष्टमी का शुभ मुहूर्त
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बासोड़ा का महत्व
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पूजा विधि
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शीतला माता की कथा
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इस दिन बनने वाले पारंपरिक व्यंजन
आइए विस्तार से जानते हैं।
कब है बासोड़ा 2026? (शीतला अष्टमी की तारीख)

हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी मनाई जाती है।
वर्ष 2026 में बासोड़ा की तिथि इस प्रकार है:
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अष्टमी तिथि प्रारंभ: 10 मार्च 2026 – सुबह लगभग 06:45 बजे
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अष्टमी तिथि समाप्त: 11 मार्च 2026 – सुबह लगभग 05:30 बजे
बासोड़ा / शीतला अष्टमी का पर्व: 11 मार्च 2026 (बुधवार)
इस दिन सुबह माता शीतला की पूजा की जाती है और ठंडे भोजन का भोग लगाया जाता है।
बासोड़ा का क्या अर्थ है?
“बासोड़ा” शब्द का अर्थ है बासी भोजन। इस पर्व पर एक दिन पहले बनाया गया भोजन अगले दिन माता शीतला को अर्पित किया जाता है।
इसी कारण इस त्योहार को कई जगहों पर बासोड़ा, बसियौरा या बासी अष्टमी भी कहा जाता है।
यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी लोग इसे श्रद्धा से निभाते हैं।
शीतला माता कौन हैं?
मां शीतला को रोगों की देवी माना जाता है। पुराणों के अनुसार वे लोगों को बीमारियों से बचाती हैं और स्वास्थ्य प्रदान करती हैं।
शीतला माता का स्वरूप बहुत विशेष माना जाता है:
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वे गधे की सवारी करती हैं
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उनके हाथ में झाड़ू होता है
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दूसरे हाथ में कलश होता है
झाड़ू का अर्थ है रोगों और अशुद्धियों को दूर करना और कलश का अर्थ है शीतलता और स्वास्थ्य प्रदान करना।
बासोड़ा / शीतला अष्टमी का धार्मिक महत्व
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बासोड़ा का पर्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि स्वास्थ्य और स्वच्छता से भी जुड़ा हुआ है।
इस दिन माता शीतला की पूजा करने से:
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परिवार में रोग दूर रहते हैं
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बच्चों की रक्षा होती है
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घर में सुख और शांति बनी रहती है
पुराने समय में जब चेचक जैसी बीमारियां ज्यादा फैलती थीं, तब लोग मां शीतला की पूजा करके रोगों से बचाव की प्रार्थना करते थे।
बासोड़ा के दिन ठंडा भोजन क्यों खाया जाता है?
बासोड़ा की सबसे खास परंपरा है एक दिन पहले बनाया गया ठंडा भोजन खाना।
इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं।
धार्मिक कारण
मान्यता है कि माता शीतला को ठंडा भोजन पसंद है। इसलिए इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता।
वैज्ञानिक कारण
यह पर्व गर्मियों की शुरुआत में आता है। पुराने समय में लोग इस दिन:
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घर की सफाई करते थे
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रसोई की सफाई करते थे
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संक्रमण से बचाव करते थे
इस तरह यह त्योहार स्वच्छता और स्वास्थ्य का संदेश देता है।
बासोड़ा पूजा का शुभ मुहूर्त
बासोड़ा के दिन पूजा प्रातःकाल करना शुभ माना जाता है।
पूजा का शुभ समय:
सुबह सूर्योदय के बाद से लेकर लगभग 9 बजे तक पूजा करना सबसे शुभ माना जाता है।
इस समय माता शीतला को ठंडे व्यंजन का भोग लगाया जाता है।
बासोड़ा पूजा विधि
बासोड़ा के दिन मां शीतला की पूजा बहुत सरल और श्रद्धा से की जाती है।
पूजा की तैयारी
पूजा के लिए आपको चाहिए:
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माता शीतला की तस्वीर या प्रतिमा
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रोली और हल्दी
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अक्षत (चावल)
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फूल
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ठंडा भोजन (भोग)
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जल से भरा कलश
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दीपक
पूजा करने की विधि
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सुबह जल्दी उठकर स्नान करें।
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साफ कपड़े पहनें।
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पूजा स्थान को साफ करें।
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माता शीतला की प्रतिमा स्थापित करें।
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दीपक जलाएं।
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रोली और अक्षत अर्पित करें।
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फूल चढ़ाएं।
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ठंडे भोजन का भोग लगाएं।
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शीतला माता की कथा सुनें।
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अंत में माता की आरती करें।
शीतला माता की पौराणिक कथा
शीतला अष्टमी से जुड़ी एक बहुत प्रसिद्ध कथा है।
बहुत समय पहले एक नगर में एक राजा और रानी रहते थे। उस नगर में हर साल शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता था। लोग एक दिन पहले भोजन बनाकर अगले दिन माता को भोग लगाते थे।
लेकिन एक बार रानी ने इस परंपरा को महत्व नहीं दिया और शीतला अष्टमी के दिन ताजा भोजन बना लिया। उसने माता की पूजा भी ठीक से नहीं की।
कुछ ही समय बाद पूरे नगर में चेचक की बीमारी फैल गई। रानी का बेटा भी इस बीमारी की चपेट में आ गया।
रानी बहुत दुखी हुई और उसने संतों से सलाह ली। संतों ने बताया कि उसने शीतला माता की परंपरा का अनादर किया है।
इसके बाद रानी ने पूरी श्रद्धा से माता शीतला की पूजा की और ठंडा भोजन का भोग लगाया।
माता शीतला उसकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उसके बेटे को स्वस्थ कर दिया।
तभी से लोग इस पर्व को पूरी श्रद्धा से मनाने लगे।
बासोड़ा के दिन बनने वाले पारंपरिक व्यंजन
बासोड़ा के दिन कई तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं, जैसे:
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पूरी
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पुआ / मालपुआ
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गुजिया
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मीठे चावल
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दही बड़े
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कढ़ी
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चने की दाल
ये सभी व्यंजन एक दिन पहले बनाए जाते हैं और अगले दिन ठंडे ही खाए जाते हैं।
बासोड़ा के दिन क्या करें?
इस दिन कुछ विशेष कार्य करना शुभ माना जाता है।
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माता शीतला की पूजा करें
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गरीबों को भोजन दान करें
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घर की साफ-सफाई करें
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परिवार के स्वास्थ्य की कामना करें
बासोड़ा के दिन क्या नहीं करना चाहिए?
इस दिन कुछ काम करने से बचना चाहिए।
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घर में चूल्हा या गैस नहीं जलाना चाहिए
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ताजा भोजन नहीं बनाना चाहिए
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झगड़ा या क्रोध नहीं करना चाहिए
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घर में गंदगी नहीं रखनी चाहिए
बच्चों के लिए क्यों खास है बासोड़ा?
बासोड़ा का पर्व खासतौर पर बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ माना जाता है।
माता-पिता इस दिन माता शीतला से प्रार्थना करते हैं कि:
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बच्चों को बीमारियों से बचाएं
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उन्हें लंबी आयु दें
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उन्हें स्वस्थ रखें
इस कारण कई घरों में बच्चों की विशेष पूजा भी की जाती है।
बासोड़ा का सामाजिक महत्व
बासोड़ा का पर्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक महत्व भी रखता है।
यह पर्व हमें सिखाता है:
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स्वच्छता का महत्व
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स्वास्थ्य की देखभाल
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परंपराओं का सम्मान
इसके साथ ही परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलकर पूजा करते हैं, जिससे परिवार में एकता बढ़ती है।
निष्कर्ष
बासोड़ा या शीतला अष्टमी भारतीय संस्कृति और परंपराओं का एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह त्योहार केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और पारिवारिक एकता का संदेश भी देता है।
2026 में बासोड़ा 11 मार्च को मनाया जाएगा। इस दिन मां शीतला की पूजा करके और ठंडे भोजन का भोग लगाकर लोग परिवार के सुख, शांति और स्वास्थ्य की कामना करते हैं।
अगर आप भी इस पर्व को पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ मनाना चाहते हैं तो माता शीतला की पूजा करें, कथा सुनें और परिवार के साथ इस पावन पर्व का आनंद लें।
